भजनामृत

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    भजन, भ्रमण एवं भंडारा, यही प.पू. भक्तराज महाराजका (प.पू. बाबाका) जीवन था ।
    उन्होंने नाम(जप)का प्रसार भजनोंके माध्यमसे किया । उनकेद्वारा स्वयं भजन गानेसे हमें नादशक्तिका भी लाभ मिलता है । गत चालीस वर्ष बाबाद्वारा वही भजन पुनः-पुनः गानेसे उनके भजनोंके प्रत्येक अक्षरपर संस्कार अंकित हो गए हैं, जिससे उनमें शब्दशक्ति भी अत्यधिक मात्रामें बढ गई है । इन सभी कारणोंसे ये भजन मात्र भजन न रहकर प्रासादिक अर्थात प्रसादस्वरूप हो गए हैं । भजनोंके पुनः-पुनः गानेसे उन्हें ‘भजनामृत’ अर्थात ‘भजनरूपी अमृत’ क्यों कहा है, इसका भी अनुभव ले सकते हैं । साधकोंको मोक्षतक ले जानेका सामर्थ्य इन भजनोंमें है । इसीलिए यह ग्रंथ अवश्य पढें !

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