सनातनकी ज्ञानगंगा !

पू.श्री. संदीप आळशी
पू. श्री. संदीप आळशी

पू.श्री. संदीप आळशी जिस प्रकार गंगानदी पृथ्वीको पावन करने हेतु शिवजीकी जटा से अवतरित हुई, उसी प्रकार सनातन संस्थाके संस्थापक प.पू. डॉ. जयंत आठवलेजीकी लेखनशक्तिसे अखिल मानव-जातिका उद्धार करने हेतु सनातनके ग्रंथोंके माध्यमसे ज्ञान-गंगा अवतरित हुई है ! सनातन संस्था के ग्रंथोंकी संख्या अब २०९ तक पहुंच गई है ! धर्म, साधना, राष्ट्ररक्षा, धर्मजागृति, आयुर्वेद इत्यादि विषयोंपर इन २०९ ग्रंथोंकी १२ भाषाओंमें ५४ लाख ४७ सहस्रसे अधिक प्रतियां प्रकाशित हुई हैं । इस उचित अवसरपर सनातनके ग्रंथोंकी उत्कृष्टता इस लेखद्वारा दर्शाई गई है ।

मैं...सनातनका ग्रंथविश्‍व अर्थात प.पू. डॉक्टरजीका धर्मदूत !

मेरी वंशावली !

मेरी वंशपरंपरा प्राचीन है । मेरे पूर्वजोंका जन्म अखिल मानवजातिके कल्याणके लिए ही हुआ था । तपस्वी ऋषि-मुनियोंको आत्मसाक्षात्कार हुआ तथा धर्मज्ञान देनेवाले वेदोंका प्रथम जन्म हुआ । आगे जैसे-जैसे युग बीतते गए, वैसे-वैसे दर्शन, रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत, पुराणोंके रूपमें हमारी वंशवेल बढती रही । भारतवर्षमें प्रत्येक कालके लिए आवश्यक ब्राह्मतेज एवं क्षात्रतेजसे युक्त धर्मग्रंथोंकी रचना होती रही । संत-महात्मा, राष्ट्रपुरुष एवं महान विचारकोंने भी विविध ग्रंथोंकी रचना की । संत ज्ञानेश्‍वरकी ज्ञानेश्‍वरी, संत तुकाराम महाराजकी तुकाराम गाथा, समर्थ रामदासस्वामीका दासबोध इत्यादि ग्रंथोंसे ब्राह्मतेज प्रकट होता रहा तथा आर्य चाणक्यकी चाणक्यनीति, स्वतंत्रतावीर सावरकरजीका १८५७ का स्वतंत्रता संग्राम, बाबासाहब पुरंदरेजीका राजा शिवछत्रपति इत्यादि ग्रंथोंसे क्षात्रतेज प्रकट होता रहा । ब्राह्मतेजयुक्त ग्रंथोंने समाजको हिंदु धर्म सिखाया तथा साधना बताकर मोक्षप्राप्तिका मार्ग दिखानेका महत्त्वपूर्ण कार्य किया । क्षात्रतेजयुक्त ग्रंथोंने निद्रित हिंदु समाजके मनमें राष्ट्र, धर्म एवं संस्कृतिकी ज्योति प्रज्वलित कर, क्रांति करनेका बहुमूल्य कार्य किया ।

मेरे ग्रंथ : आधुनिक युगकीगीता' !

श्रीमद्भगवद्गीता ग्रंथकी विशेषता क्या है ? सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अर्थात सर्व प्रकृतिधर्मों, षड्रिपुओं तथा अहंका त्याग कर, केवल मेरी शरणमें आओ, ऐसा उपदेश करनेवाले गुरु श्रीकृष्ण, अपने शिष्य अर्जुनको भगवानकी प्राप्तिका रहस्य बताकर मार्गदर्शन करते हैं । वे कहते हैं, जो परिजन, संबंधी, गुरुजन, पितामह इत्यादि युद्धकी इच्छासे सामने खडे हैं, वे अधर्मके साथ हैं । अतएव, उनका वध करना धर्मपालन ही है । इसलिए, उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्‍चयः अर्थात उठो अर्जुन, धर्मयुद्धके लिए कटिबद्ध हो जाओ । भगवानकी यह गीता ब्राह्मतेज एवं क्षात्रतेजका आदर्श संगम है । समाज अध्यात्ममार्गी, धर्माचरणी बननेसे उसमें नैतिकता, चारित्र्य, बंधुभाव, कर्तव्यदक्षता इत्यादि गुणोंका विकास होता है तथा सामाजिक स्थिरता प्राप्त होती है । इसके साथ ही अन्याय, अधर्म इत्यादिके विरुद्ध संघर्ष करनेसे राष्ट्रीय जीवनमें भ्रष्टाचार, गुंडागर्दी, सामाजिक विषमता इत्यादि दुर्गुणोंपर रोक लगती है, जिससे राष्ट्र सुरक्षित एवं सुव्यवस्थित रहता है । इसके लिए ब्राह्मतेज एवं क्षात्रतेजका उचित मेल होना आवश्यक होता है । गीता ग्रंथके समान ही मेरे ग्रंथ (सनातनके ग्रंथ) आधुनिक कालके लिए आवश्यक ब्राह्मतेज एवं क्षात्रतेजकी शिक्षा देते हैं । !

अनुभूत ज्ञानसे संपन्न मौलिक विचारधन !

वाङ्मयकी अनुभूतिसे संस्कृति टिकती है । अनुभूतियोंके ये वाङमय आगामी अनेक पीढियोंके लिए तारक होते हैं । अनुभवकी कसौटीपर खरे उतरनेवाले साहित्य और संस्कृतिका जिन्होंने जतन किया है, उनका नाम अजर-अमर हो गया है तथा वे दीपस्तंभ बनकर इस विश्‍वका मार्गदर्शन कर रहे हैं । आदि शंकराचार्य, संत एकनाथ महाराज, समर्थ रामदासस्वामी इत्यादिका चरित्र तथा वाङ्मय अनुभवोंसे ओतप्रोत है इन विभूतियोंके समान ही प.पू. डॉक्टरजीका चरित्र एवं उनकेद्वारा लिखे गए ग्रंथ मार्गदर्शक हैं । क्योंकि इनमें, विविध अवसरोंपर संतोंद्वारा सिखाया हुआ अध्यात्म, अध्यात्मके अनुसार जीवन जीते समय स्वयंको हुए अनुभव, उन अनुभवोंका किया गया विश्‍लेषण, प्रयोगोंसे अर्जित विपुल ज्ञान है ।

अध्यात्मजगतके विविध आयाम उद्घाटित करनेवाले ग्रंथ !

मेरे ग्रंथ सर्वांगस्पर्शी हैं । कर्मकाण्डके प्रति आस्थावानोंके लिए धर्मशास्त्रका प्रतिपादन करनेवाले ग्रंथ उपयुक्त होते हैं । उपासनाकाण्डके साधकोंके लिए भक्तिसे संपन्न बनानेवाले ग्रंथ मार्गदर्शक होते हैं । कलाकी रुचिवाले, सात्त्विक कलाकी रक्षा करें, इस विषयमें नया दृष्टिकोण मिलता है । राष्ट्र एवं धर्म जागृतिसे संबंधित ग्रंथ हिंदु समाजके लिए सभी दृष्टियोंसे आदर्श हिंदु राष्ट्र स्थापनाके विषयमें दिशादर्शन करते हैं । बालसंस्कार, बालविकास, आयुर्वेद आदि जीवनके तथा साधनाके प्रत्येक अंगके विषयमें व्यापक एवं संपूर्ण मार्गदर्शन करनेवाले ग्रंथ हैं ।

ग्रंथोंका प्रस्तुतीकरण कालानुरूप वैज्ञानिक रूपमें !

संत ज्ञानेश्‍वर, संत तुकाराम, संत एकनाथ, समर्थ रामदासस्वामी आदि संतोंने अभंग (मराठी काव्यका एक प्रकार), भजन, श्‍लोक इत्यादि रचकर समाजको ईश्‍वरप्राप्तिके विषयमें अनमोल मार्गदर्शन किया । उनके कालमें समाज आजकी तुलनामें अधिक सात्त्विक था । इसलिए, लोगोंको थोडे शब्दोंमें भी अध्यात्म समझमें आता था । आज समाजकी सात्त्विकता न्यूनतम स्तरपर पहुंच जानेसे उसकी अध्यात्म समझनेवाली क्षमता बहुत घट गई है । इसलिए, समाजको अध्यात्मके सभी अंगोंका विश्‍लेषण कर समझाना पडता है । इसका एक उदाहरण नीचे दे रहे हैं । संत तुकाराम महाराजने एक अभंगमें कहा है, बोलावा विठ्ठल, पहावा विठ्ठल । करावा विठ्ठल जीवभावे । अर्थात, विठ्ठल शब्दका उच्चारण करें, विठ्ठलको देखें । विठ्ठलसे प्राणसमान प्रेम करें । इस कथनका अर्थ आजके समाजको समझनेके लिए निम्नांकित प्रकारसे विश्‍लेषण कर बताना पडता है -

१. बोलावा विठ्ठल : नामजप कौन-सा करें ? नामजप करनेकी उचित पद्धत क्या है ? इत्यादि ।

२.पहावा विठ्ठल : दूसरोंमें देवताके दर्शन होनेके लिए अपने मनमें भावकी उत्पत्ति कैसे करें ? उसके लिए अपने स्वभावदोष एवं अहंको समाप्त करनेके लिए कौन-कौनसे और कैसे प्रयत्न करने चाहिए ? इत्यादि ।

३.करावा विठ्ठल जीवभावे : साधनाका क्रम क्या हो ? इत्यादि ।

मेरे ग्रंथोंमें अध्यात्मके सर्व अंगोंका उपर्युक्त प्रकारसे विश्‍लेषण किया गया है । इसलिए, ये आजके युगमें अत्यंत उपयोगी हैं । आधुनिक पीढी अध्यात्मशास्त्र विषयको वैज्ञानिक पद्धतिसे शीघ्र समझ जाती है । मेरे ग्रंथ वैज्ञानिक पद्धतिसे लिखे होनेके कारण वर्तमानमें वे समाजका उत्तम मार्गदर्शन कर रहे हैं ।

आपात्कालका भी विचार ! !

भूकंप, चक्रवात, त्सुनामी इत्यादि नैसर्गिक आपत्तियां एवं अराजकता तथा आणविक युद्ध जैसी मानवनिर्मित आपत्तियोंसे प्राणहानि एवं वित्तहानि प्रचंड मात्रामें होती है । ऐसी परिस्थितिमें जब दो समयका भोजन भी मिलना कठिन हो, तब उपचारके लिए औषधियोंके विषयमें सोचना भी व्यर्थ होता है । ऐसे भीषण आपातकालमें आपातकालके लिए आयुर्वेद समान मेरे ग्रंथ, पीडितोंके लिए नवसंजीवनी सिद्ध होंगे । मानवजातिका कल्याण करनेके लिए इतने दूरका विचार युगद्रष्टा प.पू. डॉक्टरजी ही कर सकते हैं !

आगामी अध्यात्म विश्‍वविद्यालयकी आधारशिला ग्रंथ !

आदर्श राष्ट्रका निर्माण करना हो, तो उसके लिए श्रेष्ठ नैतिक मूल्योंकी शिक्षा देनेवाली, समाज एवं राष्ट्रके प्रत्येक अंगका संपूर्ण विचार करनेवाली शिक्षातंत्र निर्मित करना परम आवश्यक होता है । ऐसे शिक्षातंत्रमें ब्राह्मतेज एवं क्षात्रतेजसे युक्त महापुरुष देनेकी क्षमता होती है । ऋषि वसिष्ठसे ऐसी शिक्षा लेकर दशरथपुत्र राम, प्रभु श्रीरामचंद्र बने, जिन्होंने असुरोंका निर्दालन कर आदर्श राज्य स्थापित किया, जो रामराज्यके नामसे विख्यात है । तक्षशिला विश्‍वविद्यालयसे शिक्षा प्राप्त कर आचार्य चाणक्य बनें, जिसने दुष्ट मगधपति नंदको सत्ताच्युत कर जनताको स्थिर मौर्यवंशी राज्य दिया । ऐसे अनेक उदाहरण गिनाए जा सकते हैं ।
भविष्यमें इसी प्रकारकी शिक्षा देनेके लिए अध्यात्म विश्‍वविद्यालयकी स्थापना करना सनातन संस्थाका ध्येय होगा । मेरे ग्रंथ उन अध्यात्म विश्‍वविद्यालयकी आधारशिला होंगे । इसके लिए धर्मशास्त्रके साथ ही राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, न्यायशास्त्र जैसे सभी विषयोंकी शिक्षा देनेमें सक्षम ग्रंथोंकी रचना करना सनातनका ध्येय है । अध्यात्म विश्‍वविद्यालयसे शिक्षा लेकर समाजमें जानेवाले विद्यार्थी न केवल संत होंगे, अपितु राष्ट्रसंत होंगे । वे, हिंदू राष्ट्र्रको निष्कंटक करनेके लिए उसका तेज और बल बढानेवाले महापुरुष होंगे!

मेरे ग्रंथोंका प्रसार कर राष्ट्र और धर्मके पुनीत कार्यमें सम्मिलित हों !

मेरे ग्रंथ घर-घर, प्रत्येक विद्यालय एवं वाचनालयमें पहुंचें; इन्हें दूसरोंको भेंटके रूपमें दें; इसके लिए प्रायोजक बनना अथवा विज्ञापन देना जैसे विविध पद्धतियोंसे आप भी ग्रंथोंका प्रसार कर सकते हैं । इस प्रकार, आप राष्ट्र एवं धर्मके पुनीत कार्यमें सहयोग कर अपना जीवन सार्थक होनेका संतोष प्राप्त कर सकते हैं !

 

- पू. श्री. संदीप आळशी, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा.

(फाल्गुन शुद्ध पक्ष षष्ठी, कलियुग वर्ष ५११४ (१८ मार्च २०१३) )