आत्मज्ञान प्राप्त करवानेवाली सनातनकी ग्रंथसंपदाका लाभ उठाएं !

प.पू. पांडे महाराज
प.पू. पांडे महाराज

सनातनके संत प.पू. पांडे महाराजजीने अनमोल शब्दोंमें सनातनकी ग्रंथसंपदाका वर्णन किया है । यह पढकर सनातन-निर्मित ग्रंथोंकी उत्कृष्टता स्पष्ट होती है । निम्नांकित विशेषताएं पढकर सनातनके ग्रंथोंद्वारा अधिकाधिक जनोंको लाभ हो तथा इसमें समाविष्ट ज्ञानका आचरण कर वे अपने जीवनको सफल बनाएं, यही अपेक्षा है !

 

१. विशेषताएं

१ अ. अध्यात्म एवं धर्मके संदर्भमें जानकारी देनेवाले सनातनके ग्रंथ ! : ‘सनातनके ग्रंथोंके कारण अध्यात्म एवं धर्मके संदर्भमें आवश्यक सर्व जानकारी हमें मिलती है । ग्रंथोंकी अनुक्रमणिकामें दिए प्रकरणोंके शीर्षकोंसे हम संपूर्ण ग्रंथकी समग्र कल्पना कर पाते हैं ।

२. अनुभूतियां

निम्न अनुभूतियां सहस्रों साधकों एवं पाठकोंको हुई हैं ।
२ अ. केवल ग्रंथ हाथमें लेनेपर विशेष अनुभूति होती है । ग्रंथ पढते समय आनंद भी प्रतीत होता है ।
२ आ. ग्रंथ पढनेपर उस विषयके संदर्भमें विषयपर विश्वास बढना : ग्रंथ पढनेके उपरांत उस विषयसंबंधी भ्रम नष्ट होते हैं, शंकाओंके समाधानसे आनंद मिलता है, प्रसन्नता होती है । अतः स्वाभाविक है कि हमारा आत्मविश्वास भी बढता है ।
२ इ. ग्रंथ सिरहाने रखकर सोनेसे शांत निद्रा आती है । कुछ समयतक ग्रंथको सिरपर रखनेसे अस्वस्थता दूर होती है ।
२ ई. घरमें सनातनकी ग्रंथसंपदा होनेसे घरका वातावरण प्रसन्न रहता है ।
२ उ. ग्रंथोंके चैतन्यके कारण अनिष्ट शक्तियोंसे रक्षा होना एवं आनंद प्रतीत होना : सनातनके ग्रंथ ईश्वरीय चैतन्यसे पूरित हैं; इसलिए अनिष्ट शक्तियां निकट नहीं आतीं एवं मन प्रसन्न रहता है ।

३. ज्ञानका महत्त्व

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्ध कालेनात्मनि विन्दति ।।

- श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक  ३८

अर्थ : इस विश्वमें अध्यात्मज्ञान जैसा विशुद्ध, पवित्र एवं उदात्त अन्य कुछ भी नहीं है । ऐसा ज्ञान सर्व सिद्धियोंका परिपक्व फल है । जो भक्तियोगके आचरणमें निपुण है एवं भक्तिभावसे शुद्ध होकर जिसका अंतःकरण शुद्ध एवं निर्मल हो गया है तथा जो उचित समयपर स्वयंमें ही इस ज्ञानका आस्वाद लेता है, उसे आत्मज्ञान प्राप्त होता है ।

४. प्रत्येक घरमें सनातनके ग्रंथोंका वाचनालय होना चाहिए !

प्रत्येक घरमें सनातनके ग्रंथोंका वाचनालय होना आवश्यक है । इससे अध्यात्मसंबंधी संदेह-भ्रम नष्ट होकर पढनेवालोंको विशुद्ध ज्ञान प्राप्त होता है ।

५. अध्यात्ज्ञान ही जीवनको आनंदमय बनानेवाली खरी धनसंपदा !

सनातनके ग्रंथोंमें भी प्रदत्त अध्यात्मज्ञान ही खरी धनसंपदा है । जिन ग्रंथोंके कारण मानवका शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक जीवन समृद्ध बनता है, उनका संग्रह करना आवश्यक है । इससे व्यक्ति कुमार्गसे परावृत्त होकर सन्मार्गपर बढने लगता है एवं उसका जीवन आनंदमय बनता है ।

६.मासिक आयसे सनातनके ग्रंथ क्रय करें एवं भावी पीढीको चरित्रवान बनाएं !

प्रत्येक व्यक्तिको अपनी मासिक आयका कुछ भाग सनातनके ग्रंथोंके क्रय हेतु रखना चाहिए; इसलिए कि हम वर्तमानमें जो संपत्ति इकट्ठी कर रहे हैं, वह हमारी भावी पीढियोंको समर्थ नहीं; अपितु विकलांग बना रही है । नैतिकताको त्यागकर अर्जित संपत्ति हमारी भावी पीढियोंको नीतिहीन एवं चरित्रहीन बना रही है । हम प्रत्यक्ष देख ही रहे हैं कि ऐसी पीढियां उनकी चल-अचल संपत्तिसहित नष्टप्राय हो रही हैं । अपनी भावी पीढियोंपर उत्तम संस्कार करने हों, उन्हें वास्तविक ऐश्वर्य एवं सुख-समृद्धि प्रदान करनी हो, तो सनातनके ग्रंथ क्रय करें, पढें एवं तदनुसार आचरण करें !

७. सनातनरूपी ग्रंथसंपदासे ही हिंदू राष्ट्र अवतरित होगा !

कलियुगमें अवतरित सनातनरूपी ग्रंथसंपदा ।
देने ज्ञान, करने मानवकल्याण, हरने विपदा ।।
करे आनंदकी वर्षा एवं चैतन्यका प्रक्षेपण ।
अवश्य होगा हिंदू राष्ट्रका अवतरण ।।

कलियुगमें सनातनरूपी ग्रंथसंपदा मानवकल्याण एवं ज्ञान प्रदान करने हेतु प्रकट हुई है । यह ग्रंथसंपदा चैतन्यका प्रक्षेपण एवं आनंदकी वर्षा करती है । फलस्वरूप हिंदु राष्ट्र अवतरित होगा ।

- प.पू. पांडे महाराज, सनातन आश्रम, देवद, पनवेल.