धर्मका मूलभूत विवेचन

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एक ओर कहते हैं कि ‘जीवनरूपी भवसागरसे तरनेके लिए धर्मके अतिरिक्त कोई उपाय नहीं’; तो दूसरी ओर कुछ लोग कहते हैं, ‘धर्म, अफीमकी गोली है’ । इस प्रकारके परस्पर-विरोधी वचन सुनकर सामान्य व्यक्ति भ्रमित हो जाता है ।
‘धर्मका नाम लेते ही लोगोंको हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, बौद्ध आदिका स्मरण होता है, जबकि कुछ लोगोंको भारतके धर्मनिरपेक्ष होनेका स्मरण होता है और वे धर्मके विषयको अस्पृश्य मान लेते हैं । श्री शंकराचार्यजीने धर्मकी व्याख्या इस प्रकार की है – धर्म वह है जिससे समाजव्यवस्था उत्तम रहती है और प्रत्येक प्राणिमात्रकी ऐहिक (लौकिक / भौतिक) तथा पारलौकिक उन्नति साध्य होती है । इस व्याख्यासे धर्मकी महत्ता और मनुष्यजीवनमें धर्मका अनन्यसाधारण महत्त्व ज्ञात होता है ।

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