कर्मका महत्त्व, विशेषताएं एवं प्रकार

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ज्ञानयोग एवं भक्तियोगकी अपेक्षा कर्मयोग प्रत्यक्ष जीवनसे अधिक संबंधित है । जीवनका सारभूत अंग माने जानेवाले कर्मका महत्त्व एवं विशेषताओंका ज्ञान (जानकारी) होनेपर कर्मके प्रति दृष्टिकोण परिवर्तित होता है, उसी प्रकार कर्म करनेके विषयमें एक नई दृष्टि प्राप्त होती है । अतः इस ग्रंथमें कर्म एवं उसकी सफलता हेतु आवश्यक घटकोंका महत्त्व विस्तृतरूपसे प्रस्तुत है । इसके साथ ही विहित एवं निषिद्ध कर्म; नित्यनैमित्तिक कर्म; वर्णाश्रमानुसार कर्म; स्वधर्मकर्म; सात्त्विक, राजसिक एवं तामसिक कर्म एवं उनका व्यक्तिके जीवनपर होनेवाला परिणाम इत्यादिविषयक विवेचन इस ग्रंथमें किया है ।

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