देवालयमें देवताके प्रत्यक्ष दर्शन तथा तदुपरान्त के कृत्योंका अध्यात्मशास्त्र

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भक्तिभावसे देवालयमें देवताके दर्शन किसी भी ढंगसे करें, भगवानकी कृपाका अनुभव निश्चित होता है; परंतु सर्वसाधारण व्यक्तिमें पर्याप्त मात्रामें भक्तिभाव नहीं होता; इसलिए उसे देवताके दर्शन अध्यात्मशास्त्रीय ढंगसे करना आवश्यक होता है ।
इस ग्रंथमें केवल उचित पद्धति ही नहीं बताई गई है; अपितु उसका सूक्ष्म-स्तरीय कारण भी बताया गया है । इससे उस पद्धतिके विषयमें अर्थात धर्मशास्त्रके प्रति श्रद्धा उत्पन्न होनेमें भी सहायता मिलती है ।

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