कुम्भमेलोंमें कुछ साधुओंका पाखण्ड

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साधुका अर्थ है त्याग, इस प्रकार साधुओंका समाजमें परम्परागत परिचय होते हुए भी कुम्भक्षेत्रके कुछ तथाकथित साधुओंके वर्तनसे लोभ, आसक्ति, लोकेषणा, द्वेष-ईर्ष्या एवं हठ का प्रदर्शन होता है ।
प्रस्तुत ग्रन्थमें ऐसे तथाकथित साधुओंके, तथा सन्त उपाधिका अनादर करनेवाले सन्तोंके वर्तनोंका विवेचन किया गया है ।
इस पृष्ठभूमिपर वास्तविक साधु-सन्तोंसे क्या कार्य अपेक्षित है, यह बताकर कुम्भमेलोंमें आदर्श कार्य करनेवाले कुछ साधु-सन्तोंका परिचय भी इस ग्रन्थद्वारा करवाया गया है ।

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