स्वभावदोष दूर कर आनन्दी बनें !

85 76

अनेक बच्चोंके मनानुसार न हो अथवा माता-पिता उनकी बात न मानें, तो वे चिढ जाते हैं, रूठ जाते अथवा निराश हो जाते हैं । ऐसे बच्चोंको स्वयंको तथा उनके कारण दूसरोंको भी, कष्ट होता है । इस ग्रन्थमें आलस्य, उद्दण्डता, अव्यवस्थितता आदि स्वभावदोषोंसे बच्चोंकी किस प्रकार हानि होती है; उनसे किस प्रकारकी चूकें होती हैं; उन दोषोंको दूर करनेके लिए बच्चोंको कैसी स्वसूचना देनी चाहिए; चूक होनेपर कौन-सा प्रायश्‍चित लेना चाहिए आदि बातोंका उदाहरणसहित विवेचन किया गया है ।

Index and/or Sample Pages

In stock