भोजन-पूर्वके आचार

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भोजनसे संबंधित आचारोंके प्रमुखतः तीन भाग होते हैं; भोजनपूर्व आचार, भोजनके समयके आचार एवं भोजनके उपरांतके आचार । रसोई बन जानेपर देवताओंको नैवेद्य दिखाना, पालथी मारकर भोजनके लिए बैठना, दाल-चावलसे भोजन प्रारंभ करना, भोजनके उपरांत टहलना (चहलकदमी करना) आदि अनेक आचार इन तीन भागोंमें अंतर्भूत हैं । इन सर्व आचारोंका धर्मशास्त्रीय आधार प्रस्तुत ग्रंथमें दिया है । ‘टेबल-कुर्सी’पर बैठकर भोजन करना, ‘कांटे-चम्मच’का उपयोग करना, बातें करते हुए भोजन करना, खडे-खडे भोजन करना अथवा जल पीना जैसे कृत्योंकी अयोग्यता भी अध्यात्मशास्त्रीय कारण-मीमांसा सहित स्पष्ट की है। अन्नसेवनका शास्त्रीय आधार एक बार समझमें आनेपर, घरपर ही नहीं, बाहर भी अन्न ग्रहण करनेका समय आए, तब भी आचारोंका पालन करने (उदा. भोजन आरंभ करनेके पूर्व उपास्यदेवतासे हाथ जोडकर प्रार्थना करना, भोजनकी थालीके सर्व ओर जलका मंडल बनाना) में किसीको लज्जा अनुभव नहीं होगी ।

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