गुरुका आचरण, कार्य एवं गुरुपरम्परा

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ज्ञानियोंके राजा गुरु महाराज ये शब्द हैं सन्त ज्ञानदेवजीके । जो ज्ञान दे, वह गुरु ! शिलासे मूर्ति बनाई जा सकती है; किन्तु उसके लिए कुशल शिल्पकारकी आवश्यकता होती है । इसी प्रकार साधक तथा शिष्य ईश्‍वरको प्राप्त कर सकते हैं; किन्तु इसके लिए गुरुकी आवश्यकता होती है ।
गुरु जब अपने बोधामृतसे साधक तथा शिष्योंका अज्ञान दूर कर देते हैं, तभी उन्हें ईश्‍वरकी प्राप्ति होती है ।

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